कावड़ यात्रा पर विशेषः

दिल्ली से सटे हस्तिनापुर के पास उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित प्राचीन परशुरामेश्र शिव मंदिर में जलाभिषेख करके भगवान परशुराम जी ने शुरू की थी पहली कांवड़ यात्रा, तभी से यह प्रथा आज भी चली आ रही है।
कथा पर गौर करें तो सर्वप्रथम भगवान परशुराम जी ने परशुरामेश्वर महादेव शिवलिंग की स्थापना कर काँवड़ चढ़ाने की प्रथा प्रारंभ की थी। त्रेतायुग की संत-स्नात धरा पर जब धर्म की पुनः स्थापना हेतु भगवान विष्णु के पूर्णवतार भगवान परशुराम का आविर्भाव हुआ, तब उनके तप, तेज, शौर्य और धर्मनिष्ठा से समस्त भू-मंडल आलोकित हो उठा। दुष्ट राजाओं और अधर्मियों के विनाश के पश्चात भगवान परशुराम ने पुण्यभूमि में “धर्मराज्य” की स्थापना की और एक महान महायज्ञ का आयोजन किया।
यज्ञ की पूर्णाहुति के उपरांत मयदानव के पुत्रों का विधिवत् राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ। ऋषियों, मुनियों, ब्राह्मणों, राजर्षियों और विद्वानों की उपस्थिति में विविध सांस्कृतिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ। रात्रि में सभी श्रद्धालु यथास्थान विश्राम हेतु विसर्जित हो गए। परंतु भगवान परशुराम की धार्मिक साधना तब तक पूर्ण नहीं मानी जा सकती थी जब तक यज्ञस्थल पर भगवान शंकर के शिवलिंग की प्रतिष्ठा न हो। अतः उन्होंने निश्चय किया कि गंगा के पवित्र जल से सिक्त पाषाण से निर्मित शिवलिंग की स्थापना करेंगे और विधिपूर्वक शिव पूजन करेंगे।
एक दिन प्रातःकाल भगवान परशुराम, कुछ ब्रह्मवेत्ताओं एवं शिवभक्तों सहित हरिद्वार की ओर प्रस्थान कर गए। वहाँ उन्होंने गंगा माता की विधिपूर्वक अर्चना की और उद्देश्य रखा शिवलिंग स्थापना हेतु पवित्र पाषाण की आवश्यकता है। परंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि जब किसी भी शिला को उठाने का प्रयास किया गया, तो कोई भी पाषाण अपने स्थान से टस से मस नहीं हुआ। पाँच-दस लोगों ने मिलकर प्रयास किया, किन्तु सभी प्रयास विफल रहे।
तब भगवान परशुराम ने करबद्ध होकर माँ गंगा से प्रार्थना की कि”हे विष्णुपदी गंगे! हे शिवांगी! हे पुण्यसलिला! लोककल्याण हेतु एक पाषाण दो, जिससे शिवलिंग की प्रतिष्ठा हो सके।” माँ गंगा तब भी मौन रहीं। भगवान परशुराम ने अनेक बार भावविभोर होकर गंगा स्तुति की। अंततः माँ गंगा प्रसन्न हुईं, जल से ऊपर उठकर प्रकट हुईं और कहा वत्स परशुराम! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जिस पाषाण को चाहो, ले सकते हो।किन्तु उसी क्षण जलमग्न पाषाणों ने करुण याचना की और बोले”माँ! हमें अपने स्नेहिल आँचल से अलग न करो। हम शिव की उपासना से विमुख नहीं हैं, किंतु तुम्हारे अमृत तुल्य जल, स्पर्श और वात्सल्य को छोड़ना नहीं चाहते। यही हमारी तपस्या है।माँ गंगा मौन हो गईं। उनके मन में ममता उमड़ आई। तब परशुराम जी ने शपथ ली और गंगा माँ से कहा”हे मातः! यदि यह शिला आपके स्नेह से वंचित नहीं होना चाहती, तो मैं प्रतिवर्ष स्वयं काँवड़ यात्रा करूँगा। हरिद्वार से गंगाजल लाकर शिवलिंग का अभिषेक करूँगा। माँ! मैं नहीं चाहता कि कोई पुत्र अपनी जननी की गोद से विछिन्न हो।
इस भक्ति-भावना से गंगा और पाषाण दोनों संतुष्ट हुए। माँ गंगा ने हर्षपूर्वक कहा”हे भार्गव राम! तुम नारायण के विशिष्टांश हो। तुम जिस शिला को चाहो, उसे सम्मानपूर्वक ले जा सकते हो। तुमने जिस कुण्ड से जल भरा है, वह स्थान आज से ‘ब्रह्मकुण्ड’ कहलाएगा।
परशुराम गंगाजल और पाषाण सहित पुण्यभूमि पर लौटे। वहाँ उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के कर-कमलों से विधिपूर्वक शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई।परशुराम द्वारा शिवलिंग पर गंगा अभिषेक करते समय स्वयं महादेव शिव प्रकट हुए और बोले हे जामदग्नेय राम! तुम श्रीनारायण के अंश होकर भी सच्चे भक्त और मेरे शिष्य के रूप में इस शिवलिंग को मेरे लिए लाए हो। तुमने मेरे अभिषेक का संकल्प लिया है, मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। यह स्थल भविष्य में ‘परशुरामेश्वर महादेव’ के नाम से प्रसिद्ध होगा। यहाँ आनेवाले भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी। तुमने काँवड़ यात्रा का जो व्रत लिया है, उसी की भाँति मैं भी यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं प्रतिवर्ष यहाँ आकर भक्तों को दर्शन दूँगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *