
दैनिक भारत न्यूज ब्यूरो
आजमगढ़।
कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाक्टर रुद्र प्रताप सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में मौसम में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। यदि मौसम विभाग की मानें तो आने वाले एक दो दिन में उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में बारिश की संभावना है। हालाँकि बहुत से जनपदों में दिन में धूप हो जा रही है तथा रात में ठंढ बढ़ जा रही है। कई जनपदों में बदली एवं धुंध जैसा मौसम भी देखने में आ रहा है। मौसम बदलने से किसान भाई चिंतित हो रहे हैं। ध्यान देने की बात है की रबी की फसलों में तापमान एक महत्वपूर्ण कारक होता है तथा फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए कम तापमान होना आवश्यक है। बहुत से किसान भाई जो गेहूं की बुवाई समय से कर दिए हैं ऐसे में यदि हल्की बारिश होती है तो बोये गए गेहूं में अच्छा लाभ होगा तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होगी तथा जो लोग देर से गेहूं की बोआई के लिए खेत की तैयारी कर रहे हैं उन्हें भी हल्की बारिश होने से अलग से पानी नहीं देना होगा, इससे समय भी बचेगा तथा सिंचाई का खर्च भी। जो किसान भाई सरसों, चना, मटर, मसूर आदि असलों की बोआई कर चुके हैं उन फसलों के लिए भी यह बारिश मुफ़ीद साबित होगी तथा फसलों की अच्छी वानस्पतिक वृद्धि होगी। आलू की फसल में भी हल्की सिंचाई से काफी फायदा होगा एक तो तापमान कम होगा जो फसल के लिए फायदेमंद होगा और दूसरा समय से सिंचाई होने से फसल की अच्छी बढ़वार मिलेगी। कद्दू वर्गीय सब्जी, गोभी, मूली, गाजर आदि में भी बारिश का अच्छा प्रभाव होगा। फसलों की अच्छी बढ़वार के लिए विलेय उर्वरक एनपीके 19:19:19 तथा पुष्पन अवस्था में 0:52:34 की 10 ग्राम मात्रा एक लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बारिश होने से मौसम में नमी होगी और तापमान कम होगा, ऐसे में बीमारियां और कीड़ों की समस्या बढ़ने की संभावना होगी। फसलों में झुलसा बीमारी पत्तियों, डंठल व कंदों पर आती है जिसमें प्रारंभिक अवस्था में छोटे हल्के पीले अनियमित आकार के धब्बे बनते हैं और बाद में गीले हो जाते हैं और पत्तियों के निचले भाग पर धब्बों के चारों ओर अंगूठीनुमा सफेदी हो जाती है। रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम व मैंकोजेब की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से अथवा मेटालैक्सिल 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। माहूँ कीट हरे रंग के छोटे आकार वाले पंखहीन अथवा पंखयुक्त होते हैं। पौधों के मुलायम भागों से रस चूस लेते हैं जिससे पौधा कमजोर हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए नीम का सत 5 प्रतिशत अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल की 1 मिली लीटर मात्रा प्रति 3 लीटर पानी की दर से छिडकाव करें।
कीट – व्याधियों के प्रबंधन के लिए समन्वित प्रबंधन अपनाएं और प्रारंभ से ही ध्यान दें। इस समय बहुत से कीड़ों के विरुद्ध ट्रैप तैयार किये गए हैं जैसे बैगन का फल एवं प्ररोह वेधक, चने का फली वेधक, सब्जियों एवं फलों की फल मक्खी, माहूँ और हरे तेला के लिए कई तरह के ट्रैप विकसित किये गए है। इनके प्रयोग के बारे में जानकारी आवश्यक है। ट्रैप के प्रयोग से हमें कीड़ों के खेतों में आने का पता चलेगा और समय से किसी भी सुरक्षित कीटनाशी का प्रयोग करके हम उनका उनका संख्या कम कर सकते हैं। इस समय अगर हम किसी फसल पर रसायन का छिड़काव करते हैं तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि जैसे सुबह और शाम के समय पत्तियों पर ओस रहती है तो ऐसे में हमें सुबह – शाम छिड़काव नहीं करना है बल्कि जब पत्तियों से ओस खत्म हो जाए उसे समय हमें सुरक्षित रसायनों का प्रयोग करना है और यह भी ध्यान रखना है। क्योंकि इस समय मधुमक्खियों का भी हमारे फूलों पर आना-जाना होता रहता है यह फसलों में परागण की क्रिया करती हैं। यह ध्यान रखना है कि छिड़काव के समय मधुमक्खियों की विजिट ना हो रही हो। सुरक्षित रसायनों का प्रयोग करें। जिससे हमारा पर्यावरण और जीवन दोनों सुरक्षित हो सके।
